50+ नीम के फायेदे , उपयोग , सावधानी और नुकशान। 50+ Health Benefits of Neem in Hindi

50+ नीम  के फायेदे , उपयोग , सावधानी और नुकशान । 50+ Health Benefits of Neem  in Hindi



नीम का सामान्य परिचय

नीम एक सर्व निवारण औसधि है अर्थात सभी रोगों से मुक्त करने वाली औसधि । नीम हमेश से ही गुणों का खदान  माना जाता है । इसका हर अंग किसी न किसी कार्य में आता है । गावों में इसे  " गाव का दवाखाना " कहा जाता है ।गांवों  में जिस घर क आँगन में नीम क पेड़ होता है उस घर के लोग कभी भी बीमार नहीं होते है।नीम का पेड़ जब बहुत पुराना होता है तो उसके लकड़ी से चन्दन जैसे खुशबू आती है ।  नीम क पत्तियों का ज्यादातर उपयोग कीटनाशक बक्टेरिया नाशक और अन्य कई गुणों भरपूर स्वास्थ समस्या के उपचार के रूप में किया जाता है ।नीम के पत्तियों का उपयोऊ दातों की सफाई के लिए भी किया जाता है ।नीम का उपयोग पेड़ से लेकर छाल तक किया जाता है । इश्क सभी अंग उपयोगी होता है । नीम को शास्त्रो में भी विशेष स्थान प्राप्त है ।नीम को लेकर हमारे भारत से लेकर अन्य कई देशो में इसके शोध होते रहे है इन सोधो से कई चमत्कारी लाभ को बताये गए है । नीम एक ऐसा पेड़ है जो अत्यधिक कडुवा होता है । परन्तु नीम अपने गुणों के कारण विश्व व्याख्यात है





नीम के पेड़ का महत्व

नीम के पेड़ का आयुर्वेद चिकित्सा व हिन्दू धर्मं में बहुत बड़ा स्थान है ।नीम का पेड़ औसधिय गुणों से भरपूर होता है ।नीम के पत्ति किसी भी प्रकार की संक्रमण को रोक सकती है।नीम का पेड़ वातावरण को सुद्ध बनाने में अपने अहम् भूमिका निभाता है । नीम के पत्तियों में अनेक प्रकार के गुणकारी तत्त्व पाए जाते है जो जीवाणु को नस्ट करते है । प्राचीन ऋषियों ने नीम के अलोकिक गुणों से यूक्त बतलाया है की नीम अनेक प्रकार की बीमारियों को मानव शारीर से दुर रखता है । नीम के पत्तियों को खाकर कई लोग कई दिनों तक जीवित रहते है । साथ ही साथ अपना शक्तिशाली अपना सामान्य जीवन व्यतीत करते है । गर्मियों के दिनों में इशकी छाया काफी सुखमई होती है ।

नीम के पेड़ में पाय जाने वाले विभिन्न तत्व

वैज्ञानिको के विश्लेषणों के अनुसार नीम में विभिन्न प्रकार के तत्व पाये जाते हैं जैसे :-

·         मार्गोसीन
·         सोडियम मार्गोसेट
·         निम्बिडिन
·         निम्बोस्टेरोल
·         निम्बिनिन
·         स्टियरिक एसिड
·         ओलिव एसिड
·         पामिटिक एसिड
·         उड़नशील तेल
·         टैनिन
·         गंधक
·         राल
·         एल्केलाइड
·         ग्लूकोसाइड
·         वसा अम्ल
·         लौहा
·         कैल्शियम
·         पोटैशियम
·         पेन्टोसन्स
·         गेलेक्टीन
·         अल्बयूमिन्स
·         ऑक्साइडस

नीम के विभिन्न अंगो के उपयोग

नीम के पत्ते नीम के पत्ती कडुवे ,कीड़ो के नाश , पित्त , खून को साफ़ करने में व विष के विकार के रूप में प्रयोग किया जाता है

नीम की कोपले :इसकी कोपले संकोचक, वातकारक, रक्तपित्त (खूनी पित्त), आंखों के रोग और कुष्ठ रोग के  नाशक के उपचार के लिए होती हैं।
नीम की सींक (डंडी) : यह रक्त (खून) साफ़ करने में , खांसी के उपचार , श्वास (दमा) के उपचार , बवासीर (अर्श), गांठे, पेट के कीड़े और प्रमेह आदि रोगों के उपचार के लिए लाभकारी  है।
नीम के फूल : नीम के फूल पित्तनाशक तथा कड़वे होते हैं। ये पेट के कीड़े और कफ को समाप्त करने के लिए उपयोग किये जाते है
कच्ची निंबौली : कच्ची निंबौली रस में कड़वी होती है , तीखी, स्निग्ध (चिकनी), लघु, गर्म होती है तथा यह फोड़े-फुंसियां और प्रमेह को दूर करती है।
नीम का पंचांग (फल, फूल, पत्ती, तना और जड़ का चूर्ण) : रुधिर (खून की बीमारी) विकार के उपचार में , खुजली, व्रण (जख्म), दाह (जलन) और कुष्ठघ्न (कोढ़ को नष्ट करने वाला) में पहुंचाता है।
नीम के बीज : नीम के बीज दस्तावर और कीटाणुनाशक हैं। पुरानी गठिया, पुराने जहर और खुजली पर इसका लेप करने से आराम मिलता है इसका बिज मधुमेह क लिए भी उपयोगी है।
नीम का तेल : नीम के तेल की मालिश करने से बहुत से रोगों से लाभ होता है व प्रतिरोधक छमता बढ़ता है ।


नीम के ५० फायेदे । 50+ Health Benefits of Neem


नीम का उपयोग खून की खराबी ठीक करने के लिए: नीम की कोपलों को सुबह खाली पेट खाना चाहिए और उसके बाद 2 घंटे तक कुछ खायें। इससे खून की सारी खराबी, खुजली, चमड़ी के रोग और वात (गैस), पित्त (शरीर की गर्मी) और कफ (बलगम) के रोग जड़ से खत्म हो जाते हैं। इसको लगातार खाने से मधुमेह (डायबिटीज) की बीमारी भी दूर हो जाती है। इससे मलेरिया और भयंकर बुखार के पैदा होने की संभावना भी नहीं रहती परन्तु ध्यान रखना चाहिए कि बड़ों को 15 कोपले (मुलायम पत्तों) और बच्चों को 7 कोपलों से ज्यादा नहीं देनी चाहिए और ज्यादा समय तक भी नहीं खाना चाहिए। नहीं तो मर्दाना शक्ति भी कमजोर हो जाती है।
नीम का उपयोग रक्तार्बुद (फोड़ा) होने पर  : नीम की लकड़ी को पानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगाने से फोड़ा समाप्त हो जाता है।

नीम का उपयोग नकसीर (नाक में से खून का आना)होने पर  : नीम की पत्तियों और अजवायन को बराबर मात्रा में पीसकर कनपटियों पर लेप करने से नाक में खून आना बन्द हो जाता है।

नीम का उपयोग सदस सिर में खुजली होने पर : नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकर सिर को धो लें सिर को धोने के बाद नीम के तेल को लगाने से सिर की जूएं और लीखों के कारण होने वाली खुजली बन्द हो जाती है नीम के बीजों को पीसकर लगाने से भी बहुत आचा  लाभ होता है।

नीम का उपयोग आंखों की पलकों के बालों का झड़ने पर: नीम के ताजे पत्तों को पीसकर फिर इसे  निचोड़कर  पलकों पर लगाने से पलकों के बाल झड़ना बन्द हो जाते हैं।

नीम का उपयोग आंखों की सूजन में: नीम की 10 से 15 हरी पत्तियों को 1 गिलास पानी में उबलने के बाद इसमें आधा चम्मच फिटकरी को मिलाकर पानी को छान लें। इस पानी से आंखों को 3 बार सेंकने से आंखों की सूजन और खुजली ठीक हो जाती है।

आंखों का फूलना, धुंध जाला में नीम का उपयोग: नीम के सूखे फूल, कलमी शोरा को बारीक पीसकर कपड़े में छानकर आंखों में काजल के रूप में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है  रतौंधी (शाम को दिखाई देना बन्द होना नाईट ब्लाइंडनेस ) में कच्चे फलों का दूध आंखों में लगाने से काफी लाभ मिलता है

यक्ष्मा (टी.बी.) में नीम का उपयोग: नीम का तेल 4-4 बूंद कैप्सूल में भरकर टी.बी. के रोग में प्रतिदिन 3 बार प्रयोग करने पर  यक्ष्मा (टी.बी.)  से  राहत  मिलता है।

दमा (श्वास) में नीम का उपयोग: 10 बूंदे नीम का तेल पान पर लगाकर खाने से दमा खांसी से मुक्ति मिलती है

पेट में दर्द होने पर नीम का उपयोग: नीम के पेड़ के तने की मोटी छाल 40-50 ग्राम को जौ के साथ कूटकर 400 मिलीलीटर पानी में पका लें और  फिर 10 ग्राम नमक को ऊपर से डाल दें, जब पानी आधा शेष बचे तो इसे गर्म-गर्म ही छानकर पीने से बहुत  लाभ मिलता  है।

गलकर कटने वाला कुष्ठ (गलित कुष्ठ) : नीम की छाल और हल्दी 1-1 किलो और 2 किलो गुड़ को बडे़ मिट्टी के मटके में भरकर उसमें 5 लीटर पानी डालकर मुंह बन्द कर घोड़े की लीद से मटके को ढ़क दें, 15 दिन बाद निकालकर रस (अर्क) निकाल लें। इस रस को 100 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम सेवन कराने से गलित कुष्ठ में लाभ होता है। इसके सेवन के बाद बेसन की रोटी घी के साथ सेवन कर सकते हैं।. पेचिश: चम्मच नीम की पत्तियों के रस में 2 चम्मच मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पानी के साथ लेने से लाभ मिलता है।

नीम का उपयोग पेचिश होने पर: 1 चम्मच नीम की पत्तियों के रस में 2 चम्मच मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पानी के साथ लेने से पेचिस से काफी लाभ मिलता है।

नीम का उपयोग जूते के कारण घाव बनने पर : नीम के तेल और नीम की पत्तियों की बारीक राख को घावों पर लगाने से आराम मिलता है।

आमातिसार: नीम की छाल की राख 10 ग्राम को दही के साथ सुबह-शाम सेवन करने से आमातिसार में लाभ होता है।

नीम का उपयोग रक्तातिसार (खूनी दस्त का आना) होने पर : नीम की 3 से 4 पकी निबौलियां खाने से लाभ मिलता है।

नीम का उपयोग सांप के काटने पर: नीम के पत्ते सुबह खाने से सांप का जहर नहीं चढ़ता है।

नीम का उपयोग खून के बहने और स्त्री प्रदर होने पर: नीम के वृक्ष के रस मे जीरा डालकर 7 दिन तक सेवन करें।

नीम का उपयोग अधिक दस्त का आना (संग्रहणी): नीम की ताड़ी को सुबह-शाम को 7-7 बूंद ताजे रस में मिलाकर 21 दिन तक सेवन करें।

नीम का उपयोग पेशाब का बन्द होने पर: नीम के फूलों को पानी में पीसकर पेडू (नाभि) पर बांधने से पेशाब खुलकर आने लगता है।

जले हुए अंग की सूजन दूर करने में नीम का उपयोग: नीम के पत्तों को पीसकर लगाना चाहिए। इससे खून साफ होकर जलन शान्त कम होती है।

अरुचि (भूख का कम लगना) में नीम का उपयोग : नीम के पेड़ के 8 से 10 कोमल पत्तों को घी में भूनकर खाने से अरुचि हट जाती है।

योनि में दुर्गन्ध आने पर नीम का उपयोग: नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर, पानी को छानकर योनि की सफाई करने से सभी तरह के जीवाणु नष्ट होते हैं और बदबू कम होती है।

मासिक-धर्म का रुकना (रजोरोध) : नीम की छाल का चूर्ण 20 ग्राम, पिसी हुई जौ, गाजर के बीज 6 ग्राम, ढाक के बीज 6 ग्राम, काले तिल और पुराना गुड़ 20-20 ग्राम, आदि को मिट्टी के बर्तन में डालकर 300  मिलीलीटर में उबालें, जब यह पानी 100 मिलीलीटर शेष बचे तो इसे छानकर 7 दिनों तक पिलाने से मासिक-धर्म खुलकर आने लगता है। ध्यान रहे कि गर्भवत्ती स्त्री को इसे नहीं देना चाहिए।

योनि की शिथिलता दूर करना : नीम के पेड़ की छाल को अनेक बार पानी में धोयें, फिर उस पानी में रूई को भिगोकर रोजाना योनि में रखें तथा धोने से बची हुई छाल को सुखाने के बाद जलाकर उसका धुंआ योनि में देने से तथा नीम के पानी से बार-बार योनि को धोने से योनि टाईट हो जाती है।

पेशाब करने में कठिनाई होने पर नीम का उपयोग (मूत्रकृच्छ) : नीम की सींक और पत्तों के 25 मिलीलीटर रस को उन्नाव औषधि के साथ पिला सकते हैं।

कफज मेह में नीम का उपयोग: नीम के सींकों के काढ़े में 1 ग्राम त्रिकुटा चूर्ण मिलाकर 30 दिनों तक सेवन करने से कफज मेह दूर होते हैं।

सुजाक (गिनोरिया) : नीम की छाल के मोटे-मोटे चूर्ण को 40 ग्राम लेकर लगभग 3 लीटर पानी के साथ मिट्टी के बर्तन में उबालें, जब यह 200 मिलीलीटर शेष बचे तो इसे छानकर पुन: पकायें और 20 या 25 ग्राम कलमीशोरा चूर्ण चुटकी से डालते जायें तथा नीम की लकड़ी से हिलाते रहें, फिर इसे पीस-छानकर रख लें। इस काढ़े को लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की मात्रा में रोजाना गाय के दूध की लस्सी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।

आतशक : 1 चम्मच नीम के तेल को रोजाना पीने से तथा गुप्तांगों पर लगाने से आतशक 14 दिनों में ठीक हो जाता है।

कफज्वर : नीम की छाल, पीपल की जड़, हरड़, कुटकी और अमलतास को बराबर मात्रा में लेकर 1 लीटर पानी में उबालें, जब यह आठवां हिस्सा शेष बचे तो इसे आग पर से उतार लें, इस काढ़ा को 10-20 ग्राम सुबह-शाम सेवन करें।

नीम का उपयोग आगन्तुक व्रण (जख्म) और फोड़े होने पर : गर्म तेल में नीम के पत्तों को जलाकर बारीक कर लें। इसे फोड़े और आगन्तुक घाव के जख्मों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।

नीम का उपयोग बिच्छू के काटने पर : बिच्छू के दंश पर नीम के पत्ते या फूल सुंघाना चाहिए या नीम की पत्तियों को चबाते हुए मुंह की हवा बाहर निकालकर दंश से पीड़ित अंग के दूसरी ओर के कान में फूंक देना चाहिए।

त्वचा का खुरदरा होना: नीम के पत्तों की पोटली से त्वचा को सेंककर नीम के पानी से नहाना चाहिए और फिर नीम के पत्तों को जलाकर उनकी राख को लगाने से त्वचा नर्म हो जाती है।
निमोनिया (ठंड़ लगकर बुखार का आना) : नीम की पत्तियों के रस को थोड़ा-सा गर्म करके सीने पर मालिश करें।

छोटी लड़कियों के कान के छेदने पर होने वाले दर्द में नीम का उपयोग: कान के छेदने के 21 दिन बाद नीम की सींक छेद में डालने से घाव जल्दी ठीक होता हैं। उनमें जीवाणु नहीं पड़ते हैं तथा इसके बाद गहने पहनने से कान पकते नहीं हैं।

विश्राम स्थल : नीम के पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करने से मन प्रसन्न और शरीर स्वस्थ रहता है।

मच्छर के लिए : सूखी नीम की पत्तियों को जलाकर धुंआ करने से मच्छर भाग जाते हैं।

पाचन : नीम की मुलायम कोपलों को चबाने से हाजमा ठीक रहता है।

अनाज को सुरिक्षत रखना : सूखी पत्तियों को अनाज में रखने से उनमें कीड़े नहीं पड़ते हैं।
कपड़ों तथा किताबों में कीड़े होने पर : नीम की पीली और सूखी पत्तियों को रखने से कीड़े नहीं लगते हैं।

गले में दर्द : 2 चम्मच नीम की पत्तियों के रस को 1 गिलास गर्म पानी में, आधा चम्मच शहद मिलाकर रोजाना गरारे करें। इससे गले में जलन, दर्द तथा जमा हुआ कफ दूर होता है।

जोड़ों में दर्द : नीम के तेल की मालिश या नीम के पत्ते को पानी में उबालकर भाप से सेंकने और गर्म पत्ते बांधने से आराम मिलता है।

कनफेड : नीम की 4 कच्ची निंबौली सुबह-शाम रोजाना 2 बार चबाने से लाभ होता है।
अपच (भोजन का पचना): नीम की पत्ती 25 ग्राम, 3 लौंग, 3 कालीमिर्च पीसकर थोड़ा-सा पानी और शक्कर (चीनी) मिलाकर सुबह-शाम रोजाना दिन में 3 बार पीयें।

मासिकस्राव में होने वाला जांघों का दर्द : मासिक-धर्म के दिनों में दर्द जांघों में हो तो नीम के पत्ते का रस 6 मिलीलीटर, अदरक का रस 12 मिलीलीटर को पानी में मिलाकर पिलाने से दर्द में तुरन्त आराम मिलता है।

बुखार की कमजोरी : नीम की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से बुखार के बाद आई कमजोरी मिटती है।

दिमाग के कीड़ों के लिए : लगभग 5 मिलीलीटर नीम के पत्तों के रस को लगभग 50 मिलीलीटर तिल के तेल में मिलाकर नाक में डालकर सूंघने से दिमाग के कीड़े मर जाते हैं।
सुख से प्रजनन के लिए : नीम के वृक्ष की जड़ को कमर पर बांधने से प्रसव (बच्चे का जन्म) आसानी हो जाता है, प्रसव होने पर इसे हटाना चाहिए।

स्थावर, जंगम तथा सभी जहरों पर : सेंधानमक और कालीमिर्च को बराबर मात्रा में लें तथा इन दोनों के बराबर ही नीम की निंबौली लेकर एक साथ पीस लें, फिर इसे शहद और घी के साथ सेवन करने से आराम मिलता है।

सभी प्रकार के जख्मों पर : नीम के पत्ते, दारूहल्दी और मधुयिष्ठ के चूर्ण में घी और शहद को मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को लगाने से घाव तुरन्त भर जाता है।

गर्मी में शरीर में ठंड लाने और दस्त रोकने के लिए : नीम के पत्तों को पीसकर उसमें शक्कर (चीनी) मिलाकर पिलाना चाहिए

प्रमेह (वीर्य विकार), उपदंश (गर्मी) और बादी पर : नीम की छाल को मिट्टी के बर्तन में रख लें, उसमें लगभग 1 लीटर उबाला हुआ पानी डालें और ढककर रख दें, दूसरे दिन शक्ति के अनुसार 1 या 2 बार, 40-40 मिलीलीटर पीना चाहिए। इससे 1-2 सप्ताह में ही गर्मी (उपदंश) जन्य रोग अच्छे हो जाते हैं। इस प्रयोग के दौरान घी, शक्कर और रोटी के अलावा कुछ भी खाएं।

उरूस्तंभ होने पर (जांघों की सुन्नता) : नीम की जड़ को घिसकर गर्म लेप करना चाहिए।

दांतों का दर्द : नीम की दातुन करने से दांतों में कीड़े नहीं लगते तथा दांतों में लगे हुए कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

सविराम बुखार : नीम के तेल की 5 से 10 बूंदे सुबह-शाम सेवन करने से सविराम बुखार में लाभ होता है।

नीम की छाल, सोंठ, गिलोय, कटेरी, कचूर, अडूसा, कुटकी, कायफल, पोहकर मूल (जड़), छोटी पीपल और शतावर आदि को मिलाकर काढ़ा बनाकर पिलाने से कफ के बुखार में लाभ होता है।
नीम की छाल, सोंठ, गिलोय, पोहकर मूल, छोटी पीपल, कटाई, चिरायता, कचूर और शतावर को मिलाकर पीस लें। इसे 3-3 ग्राम की मात्रा में रोगी को देने से कफ का बुखार दूर होता है।
दांतों को साफ और चमकदार बनाना : नीम की टहनी पत्तियों सहित छाया में सुखाकर आग में जला लें। इसकी राख में लौंग मिलाकर पीसकर मंजन बना लें। इससे रोजाना मंजन करने से दांत साफ चमकदार बनते हैं तथा दांतों में कीड़े नहीं लगते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

थायराइड होने पर इन घरेलू उपचार को करे Do these home remedies when thyroid is present

मोटापा कम करने के लिए रामदेव बाबा के 15 योग आसन। Baba Ramdev yoga

ऐसे करे् त्वचा के लिए मेथी का प्रयोग Use a fenugreek for this purpose